दुःस्थानता

दुःस्थानता (Dystopia) एक ऐसे काल्पनिक समाज को कहा जाता है जो अवांछनीय, भयावह या दमनकारी होता है, और यह अक्सर यूटोपिया (Utopia) के विलोम के रूप में प्रयोग होता है। यूटोपिया शब्द सर थॉमस मोर ने १५१६ में गढ़ा था, जबकि 'दुःस्थानता' शब्द का सबसे पहला ज्ञात प्रयोग जॉन स्टुअर्ट मिल ने १८६८ में एक संसदीय भाषण में किया था; इससे पहले जेरेमी बेंथम ने १८१८ में इसी विचार के लिए 'कैकोटोपिया' शब्द प्रस्तावित किया था। ऐसे समाजों की विशेषताओं में अत्याचारी सरकारें, प्रचार और सेंसरशिप द्वारा पूर्ण नियंत्रण, व्यक्तित्व का नुकसान, और बड़े पैमाने पर अनुरूपता थोपना शामिल है। इन कहानियों का मकसद अक्सर समाज, राजनीति, प्रौद्योगिकी या पर्यावरण की आलोचना करना होता है। सबसे प्रसिद्ध डायस्टोपियन रचनाओं में जॉर्ज ऑरवेल का नाइनटीन एट्टी-फोर (१९४९), एल्डस हक्सले का ब्रेव न्यू वर्ल्ड (१९३२), और रे ब्रैडबरी का फारेनहाइट ४५१ (१९५३) शामिल हैं। यह शैली मौजूदा प्रवृत्तियों को बढ़ा-चढ़ाकर सबसे खराब स्थिति दिखाती है, लेकिन इसे उत्तर-सर्वनाश कथाओं से अलग माना जाता है, क्योंकि वहाँ केवल समाज का पतन होता है बल्कि शासन का विरोधी ढाँचा होता है।