कंपनी अधिनियम, 1956

कंपनी अधिनियम, 1956 भारत की संसद द्वारा 1956 में पारित एक अति महत्वपूर्ण विधान था, जिसने केंद्र सरकार को कंपनियों के गठन, पंजीकरण और प्रबंधन को विनियमित करने की शक्ति प्रदान की। इसे कारपोरेट मामलों के मंत्रालय और कंपनी रजिस्ट्रार के कार्यालयों के माध्यम से प्रशासित किया गया, जिसका उद्देश्य व्यावसायिक ईमानदारी, लेखा-परीक्षा के उचित मानक स्थापित करना तथा शेयरधारकों और लघु निवेशकों के हितों की रक्षा करना था। इस अधिनियम ने कंपनी निदेशकों की जिम्मेदारी निर्धारित करने, वार्षिक वित्तीय रिपोर्टों में पारदर्शिता लाने और प्रबंधन के लेन-देन पर निगरानी रखने जैसे महत्वपूर्ण नियम स्थापित किए। बदलते व्यापारिक परिवेश के अनुरूप इसमें कई संशोधन किए गए, विशेष रूप से 2000 और 2002 में, जिन्होंने कॉर्पोरेट गवर्नेंस को और अधिक मजबूत बनाया। अंततः इस ऐतिहासिक अधिनियम को समाप्त करके इसके स्थान पर कंपनी अधिनियम, 2013 लागू किया गया, जो 12 सितंबर 2013 से प्रभावी हुआ और कंपनियों के निर्माण, निदेशकों की भूमिका तथा विघटन की प्रक्रिया को नए सिरे से परिभाषित करता है।