दबौया सांप

रसेल की सांप (Daboia russelii) - एक व्यापक सारांश

रसेल की सांप (वैज्ञानिक नाम: Daboia russelii) भारतीय उपमहाद्वीप और दक्षिण पूर्व एशिया में पाई जाने वाली एक अत्यंत विषैली सांप है, जिसे स्कॉटिश सर्पविज्ञानी पैट्रिक रसेल के सम्मान में नामित किया गया था। यह सांप भारत के "चार बड़े सांपों" (Big Four) में से एक है और सर्पदंश से होने वाली अधिकांश मौतों के लिए जिम्मेदार है, क्योंकि यह व्यापक रूप से फैला हुआ है, स्वभाव से आक्रामक है, और घनी आबादी वाले क्षेत्रों में पाया जाता है।

यह सांप अधिकतम 166 सेंटीमीटर (5.5 फीट) तक लंबा हो सकता है, जिसका सिर चपटा, त्रिकोणीय और गर्दन से स्पष्ट रूप से अलग होता है। इसके शरीर पर गहरे भूरे रंग के धब्बों की तीन श्रृंखलाएं होती हैं, जो सफेद या पीले रंग की सीमा से घिरी होती हैं, और सिर पर एक विशिष्ट 'V' या 'X' आकार का निशान पाया जाता है। इसके दांत 16.5 मिलीमीटर तक लंबे हो सकते हैं, और इसका रंग गहरे पीले, भूरे, लाल या भूरे रंग का होता है।

भारत में इसे विभिन्न क्षेत्रीय नामों से जाना जाता है - हिंदी में 'दबौया', बांग्ला में 'चन्द्र बोरा', कन्नड़ में 'मंडलद हावु', मराठी में 'घोणस' और तमिल में 'कन्नाडी पांबु'। यह सांप मुख्य रूप से खुले घास के मैदानों, झाड़ियों और कृषि क्षेत्रों में पाया जाता है, जहां यह कृन्तकों का शिकार करता है। इसकी विषैली प्रकृति और मनुष्यों के निकट रहने की प्रवृत्ति के कारण, यह एशिया में सर्पदंश के सबसे गंभीर मामलों का कारण बनता है, जिससे रक्त का थक्का जमना, किडनी फेल होना और कभी-कभी मृत्यु भी हो सकती है।