आरोग्यकारी याचिका
भारत के उच्चतम न्यायालय ने वर्ष 2002 में रूपा अशोक हुर्रा बनाम अशोक हुर्रा के ऐतिहासिक मामले में 'आरोग्यकारी याचिका' (Curative Petition) की अवधारणा विकसित की, जो समीक्षा याचिका खारिज होने के बाद न्याय पाने का अंतिम संवैधानिक उपाय है। यह प्रक्रिया अनुच्छेद 137 के तहत न्यायालय की अंतर्निहित शक्तियों पर आधारित है, जिसका मुख्य उद्देश्य न्यायहानि को रोकना और अदालती प्रक्रिया के दुरुपयोग को रोकना है। इस याचिका पर विचार करने के लिए यह स्थापित करना अनिवार्य है कि प्राकृतिक न्याय के सिद्धांतों का घोर उल्लंघन हुआ है, साथ ही इसे एक वरिष्ठ अधिवक्ता द्वारा प्रमाणित कराना आवश्यक है कि उठाए गए आधार पहले की समीक्षा याचिका में मौजूद थे। इसे सुनवाई हेतु तीन सबसे वरिष्ठ न्यायाधीशों के समक्ष प्रस्तुत किया जाता है, और दिलचस्प बात यह है कि इसे दाखिल करने की कोई समय सीमा नहीं है, जबकि सामान्य समीक्षा याचिका निर्णय के 30 दिनों के भीतर दाखिल करनी होती है। यदि याचिका निराधार पाई जाती है, तो न्यायालय याचिकाकर्ता पर 'अनुकरणीय जुर्माना' भी लगा सकती है; यही कारण है कि समीक्षा याचिका संवैधानिक प्रावधान है, जबकि आरोग्यकारी याचिका न्यायालय द्वारा बनाई गई एक विशेष न्यायिक रचना है।
Source: आरोग्यकारी याचिका — Wikipedia · Summary by RollWiki AI · Language: Hindi