तुला
तुला (तराजू) का ऐतिहासिक परिचय
तुला द्रव्यमान मापने का एक प्राचीन उपकरण है, जिसका उपयोग प्रागैतिहासिक सिंधु घाटी सभ्यता में ईसा पूर्व तीसरी सहस्राब्दी से पहले से ही कीमती वस्तुओं को तौलने के लिए किया जाता था। प्राचीन तुलाओं में दो पलड़े होते थे, जिन्हें काँसे की डंडी से डोरियों द्वारा बाँधा जाता था, और पलड़े प्रायः ताँबे के बनाए जाते थे।
वैदिक साहित्य में तुला का उल्लेख वाजसनेयी संहिता और शतपथ ब्राह्मण में मिलता है, जबकि कौटिल्य के अर्थशास्त्र में 16 प्रकार की तुलाओं का वर्णन किया गया है, जिनमें से दस साधारण भार और छह भारी वस्तुओं के तौलने के लिए होती थीं। प्राचीन भारत में तुला की जाँच का नियम भी था—कौटिल्य के अनुसार यह परीक्षण प्रति चौथे मास और मनुस्मृति के अनुसार प्रति छह मास होना चाहिए था।
सिंधु घाटी से प्राप्त बटखरों का आनुपातिक संबंध दहाई पद्धति पर आधारित था, जिसकी सबसे छोटी इकाई 0.2565 ग्राम सिद्ध हुई है। प्राचीन भारतीय मान-पद्धति में कृष्णल, सुवर्ण, पल, धरण, कर्ष, प्रस्थ और द्रोण जैसी इकाइयाँ प्रचलित थीं, जिनका उपयोग सोने-चाँदी जैसी कीमती धातुओं को तौलने में होता था। मनु और याज्ञवल्क्य ने इन मान-पद्धतियों का विस्तृत विवरण दिया है, जिससे ज्ञात होता है कि प्राचीन भारत में मापन प्रणाली अत्यंत विकसित और वैज्ञानिक थी।
Source: तुला — Wikipedia · Summary by RollWiki AI · Language: Hindi
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