सौ विचारधाराएँ

प्राचीन चीन में ७७० ईसा पूर्व से २२१ ईसा पूर्व तक चले बसंत-शरद और झगड़ते राज्यों के काल में पनपी सौ विचारधाराएँ (झूज़ी बाईजिआ) चीनी दर्शनशास्त्र का स्वर्णयुग मानी जाती हैं, जहाँ राजनीतिक अस्थिरता के बावजूद बुद्धिजीवियों को खुलकर चिंतन की असाधारण आज़ादी मिली थी। इस युग की सबसे प्रभावशाली विचारधारा कन्फ्यूशियसवाद (रुजिया) थी, जिसे कन्फ्यूशियस (५५१-४७९ ईसा पूर्व) ने सामाजिक कर्तव्यों, नैतिकता और पारिवारिक रिश्तों के आधार पर विकसित किया, जिसने चीन की सरकार और समाज को सदियों तक प्रभावित किया। इसके विपरीत, न्यायवाद (फ़जिया) के प्रस्तावक हान फ़ेईज़ी और ली सी ने मानव स्वभाव को स्वार्थी मानकर समाज को नियंत्रित करने के लिए कठोर कानूनों और शक्तिशाली राज्य की आवश्यकता पर बल दिया, जो बाद में कन्फ्यूशियसवाद के साथ मिलकर १९वीं शताब्दी तक चीन की शासन पद्धति का आधार बना। ताओवाद (ताओ चिया) ने लाओ-त्सू और झुआंगज़ी की शिक्षाओं के माध्यम से प्रकृति के साथ सामंजस्य और ब्रह्मांड की धारा में बहने पर ज़ोर दिया, जबकि मोहीवाद (मो चिया) के संस्थापक मोज़ी ने समान प्रेम, सादगी और युद्धों का विरोध करते हुए वैश्विक कल्याण की वकालत की। हालाँकि चिन राजवंश में मोहीवाद को कुचल दिया गया था, लेकिन इन सभी विचारधाराओं का विस्तृत विवरण महान इतिहासकार के अभिलेख (शीजी) नामक प्रसिद्ध ग्रंथ में मौजूद है, जो इस अद्भुत बौद्धिक विविधता को आज तक संजोए हुए है।