शिमला समझौता

1971 के युद्ध में पाकिस्तान की करारी हार (90,000 से अधिक सैनिकों के आत्मसमर्पण और बांग्लादेश के निर्माण) के बाद, भारत और पाकिस्तान के बीच 2 जुलाई 1972 को शिमला में एक ऐतिहासिक समझौते पर हस्ताक्षर किए गए। इस समझौते पर भारत की प्रधानमंत्री इंदिरा गांधी और पाकिस्तान के राष्ट्रपति ज़ुल्फिकार अली भुट्टो ने हस्ताक्षर किए, जो 28 जून से 1 जुलाई तक चली वार्ता के बाद अचानक 2 जुलाई को संपन्न हुआ। समझौते के तहत दोनों देशों ने कश्मीर सहित सभी विवादों को केवल आपसी बातचीत से सुलझाने और 17 दिसंबर 1971 की स्थिति को वास्तविक नियंत्रण रेखा (LoC) मानने पर सहमति जताई। हालाँकि, पाकिस्तान ने इस समझौते का बार-बार उल्लंघन किया, जिसका सबसे बड़ा उदाहरण 1999 में कारगिल युद्ध में घुसपैठ करना था, जिससे समझौते की विश्वसनीयता पर सवाल उठे। यह समझौता भारत-पाकिस्तान संबंधों में एक महत्वपूर्ण मोड़ था, क्योंकि इसने युद्ध के बाद के मुद्दों (युद्धबंदियों, राजनयिक संबंधों) को सुलझाने की नींव रखी, लेकिन पाकिस्तान की हठधर्मिता और विदेशी दबाव के कारण इसे कमजोर माना जाता है।