मुद्रा युद्ध

मुद्रा युद्ध (प्रतिस्पर्धी अवमूल्यन) वह स्थिति है जिसमें देश अपनी मुद्रा का मूल्य घटाकर निर्यात को सस्ता और प्रतिस्पर्धी बनाते हैं, जिससे घरेलू उद्योगों और रोजगार को बढ़ावा मिलता है, हालांकि इससे आयात महंगा हो जाता है और नागरिकों की क्रय शक्ति घटती है। ऐतिहासिक रूप से यह दुर्लभ था, लेकिन 1930 के दशक में महामंदी (Great Depression) के दौरान देशों ने स्वर्ण मानक छोड़कर इस रणनीति का सहारा लिया, जिससे अंतर्राष्ट्रीय व्यापार को भारी नुकसान हुआ। 2010 में ब्राजील के पूर्व वित्त मंत्री गुइडो मेंटेगा ने वैश्विक मुद्रा युद्ध की घोषणा की, जिसमें मुख्य तनाव अमेरिका और चीन के बीच युआन के मूल्यांकन को लेकर था, हालांकि यह विवाद 2011 के मध्य तक काफी हद तक शांत हो गया। जनवरी 2013 में जापान द्वारा अपनी मुद्रा के अवमूल्यन के कदमों ने दूसरे मुद्रा युद्ध की आशंका जगाई, लेकिन G7 और G20 के बयानों ने इसे शांत किया; फिर जनवरी 2015 में यूरोपीय सेंट्रल बैंक (ECB) द्वारा मात्रात्मक सहजता (Quantitative Easing) शुरू करने पर यह चर्चा फिर से तेज हो गई। इस युद्ध में अमेरिका ने प्रत्यक्ष हस्तक्षेप, पूंजी नियंत्रण और मात्रात्मक सहजता जैसे मिश्रित उपाय अपनाए, लेकिन जब सभी देश एक ही रणनीति अपनाते हैं, तो इसका परिणाम समग्र अंतर्राष्ट्रीय व्यापार में गिरावट के रूप में सामने आता है।