कुँवर नारायण

कुँवर नारायण (1927-2017) हिन्दी साहित्य के एक महान हस्ताक्षर थे, जो नई कविता आन्दोलन के प्रमुख स्तंभ और अज्ञेय द्वारा संपादित 'तीसरा सप्तक' (1959) के कवियों में शामिल रहे। इतिहास और मिथक के जरिये वर्तमान को देखने वाले इस साहित्यकार को वर्ष 2005 के लिए साहित्य जगत के सर्वोच्च सम्मान ज्ञानपीठ पुरस्कार (2009 में) से नवाजा गया। लखनऊ विश्वविद्यालय से अंग्रेज़ी साहित्य में एम.ए. (1951) करने के बाद उन्होंने 1956 में अपना पहला काव्य संग्रह 'चक्रव्यूह' प्रकाशित किया और कविता, कहानी, समीक्षा तथा सिनेमा-रंगमंच पर भी उल्लेखनीय लेखन किया। उनकी कृति 'आत्मजयी' (1965) कठोपनिषद के नचिकेता की कथा से मृत्यु के प्रश्न को सुलझाती है, जबकि 'वाजश्रवा के बहाने' (2008) पिता-पुत्र के समन्वय और जीवन के आलोक को सात्विक शब्दों में प्रस्तुत करती है। अपनी प्रयोगधर्मिता और सहज संप्रेषणीयता के चलते उनकी रचनाओं का कई भारतीय और विदेशी भाषाओं में अनुवाद हुआ, जिससे वे हमारे दौर के सर्वश्रेष्ठ साहित्यकारों में अमर हो गए।