अन्य पिछड़ा वर्ग
अन्य पिछड़ा वर्ग (ओबीसी) भारत सरकार द्वारा सामाजिक एवं शैक्षणिक रूप से पिछड़ी जातियों के लिए प्रयुक्त एक सामूहिक वर्ग है, जो सन् 1991 में मंडल आयोग की रिपोर्ट के आधार पर अस्तित्व में आया, और इसे सार्वजनिक क्षेत्र के रोजगार तथा उच्च शिक्षा में 27% आरक्षण का अधिकार प्राप्त है।
इसके तहत जनवरी 1979 में गठित मंडल आयोग (अध्यक्ष: बिन्देश्वरी प्रसाद मंडल) ने दिसंबर 1980 में रिपोर्ट प्रस्तुत की, जिसमें ओबीसी की जनसंख्या कुल आबादी का लगभग 52% बताई गई और प्रारंभिक सूची में 3,743 पिछड़ी जातियाँ थीं, जो 2006 तक बढ़कर 5,013 हो गईं। सन् 2018 की एक रिपोर्ट के अनुसार, इनमें से केवल 25% जातियाँ ही आरक्षण का 97% लाभ लेती हैं, जबकि 37% जातियों में शून्य प्रतिनिधित्व है, इसलिए इसकी सूची सामाजिक न्याय एवं अधिकारिता मंत्रालय द्वारा गतिशील रूप से जोड़ी-हटाई जाती है।
कानूनी विवादों के क्षेत्र में, 1992 के इंदिरा साहनी बनाम भारत संघ (ऐतिहासिक निर्णय) ने 50% कोटा की सीमा तथा 'क्रीमी लेयर' की अवधारणा स्थापित की—इस शब्द का गठन पहले 1975 में न्यायमूर्ति कृष्णा अय्यर ने किया था, जिसकी आय सीमा 1993 में ₹1 लाख से संशोधित होती हुई 2013 में ₹6 लाख कर दी गई।
यह वर्ग अनुसूचित जातियों (एससी) और अनुसूचित जनजातियों (एसटी) के समानान्तर एक अलग श्रेणी है, जिसकी सूची राष्ट्रीय पिछड़ा वर्ग आयोग (एनसीबीसी) और राज्यों द्वारा अलग-अलग बनाई जाती है, और इनके कल्याण के लिए सन् 1985 में एक समर्पित मंत्रालय स्थापित किया गया था।
Source: अन्य पिछड़ा वर्ग — Wikipedia · Summary by RollWiki AI · Language: Hindi