भारत का उच्चतम न्यायालय

  • स्थापना व वर्तमान स्थिति : भारत का उच्चतम न्यायालय 28 जनवरी 1950 को संविधान लागू होने के दो दिन बाद प्रिवी काउंसिल की न्यायिक समिति को प्रतिस्थापित करते हुए देश का सर्वोच्च न्यायिक निकाय बना, जिसके पास न्यायिक पुनरावलोकन (अमेरिका से प्रेरित) की शक्ति है; वर्तमान में मुख्य न्यायाधीश संजीव खन्ना हैं तथा न्यायालय में मुख्य न्यायाधीश सहित अधिकतम 34 न्यायाधीश होते हैं।
  • शक्तियाँ व क्षेत्राधिकार : यह न्यायालय मूल, अपीलीय और सलाहकार क्षेत्राधिकार से संपन्न है, जो नागरिकों के मौलिक अधिकारों की रक्षा, केंद्र-राज्यों के बीच विवादों का निपटारा तथा अनुच्छेद 142 के तहत न्याय के हित में आवश्यक आदेश पारित करने का अधिकार रखता है, साथ ही राष्ट्रपति द्वारा संविधान के प्रश्नों पर इसकी सलाह ली जाती है।
  • भवन व इतिहास : शुरुआत में संसद भवन के 'चैंबर ऑफ प्रिंसेस' में कार्य करने वाला यह न्यायालय 1958 में नई दिल्ली के तिलक मार्ग स्थित अपने वर्तमान 22 एकड़ परिसर में स्थानांतरित हुआ, जिसे वास्तुकार गणेश भीकाजी देवलालीकर ने इंडो-ब्रिटिश शैली में न्याय के तराजू (बैलेंस) की आकृति के रूप में डिज़ाइन किया था।
  • वेतन व कार्यकाल : संविधान के अनुच्छेद 125 के तहत न्यायाधीशों का वेतन संसद द्वारा संचित निधि से निर्धारित होता है, जिसके अनुसार मुख्य न्यायाधीश को मासिक ₹2,80,000 तथा अन्य न्यायाधीशों को ₹2,50,000 की आय दी जाती है, और इनके कार्यकाल की समाप्ति 65 वर्ष की आयु होती है।
  • विश्व स्तरीय विशेषता : भारत का उच्चतम न्यायालय दुनिया की सबसे लंबी कार्य अवधि वाली शीर्ष अदालतों में से एक है; इसके परिसर में कुल 15 अदालती कमरे हैं, जिसमें मुख्य न्यायाधीश की अदालत सबसे बड़ी है, और 1979 में दो नए विंग (पूर्व व पश्चिम) जोड़े गए, इस प्रकार यह भारतीय न्यायिक प्रणाली का शीर्ष पथक है।